उपमन्यु ऋषि

ऋषि उपमन्यु – जड़ों, परंपराओं और मूल्यों के प्रेरणास्रोत

ऋषि उपमन्यु हिंदू धर्म के एक अत्यंत सम्मानित वैदिक ऋषि और भगवान शिव के अनन्य भक्त थे, जिन्हें विशेष रूप से उनकी अद्वितीय गुरु-भक्ति और तपस्या के लिए जाना जाता है। वे महर्षि व्याघ्रपाद के ज्येष्ठ पुत्र और ऋषि धौम्य के शिष्य थे। महाभारत और शिव पुराण के अनुसार, अपनी माता की प्रेरणा से उन्होंने दूध की प्राप्ति के लिए हिमालय पर भगवान शिव की घोर तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर शिव जी ने उन्हें क्षीर सागर (दूध का सागर) प्रदान किया और उन्हें अपने गणों का अध्यक्ष बनाया। उनके जीवन की एक प्रसिद्ध कथा गुरु धौम्य के आश्रम की है, जहाँ गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए उन्होंने भूख के कारण अर्क (मदार) के पत्ते खा लिए थे, जिससे वे अंधे होकर एक कुएँ में गिर गए थे; बाद में उन्होंने अश्विनी कुमारों की स्तुति कर अपनी दृष्टि पुनः प्राप्त की। ऋषि उपमन्यु को भगवान श्रीकृष्ण के दीक्षा गुरु के रूप में भी जाना जाता है, जिन्होंने श्रीकृष्ण को ‘पाशुपत मंत्र’ की दीक्षा दी थी। आज भी “उपमन्यु गोत्र” के ब्राह्मण उन्हें अपना आदि-पुरुष मानते हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार, ऋग्वेद के सूक्त 1.102.9 के रचयिता भी ऋषि उपमन्यु ही माने जाते हैं।