1857 की क्रांति के समय कोराईं गाँव के जमींदार पंडित गयादीन दुबे के पास 62 गाँवों की जमींदारी तथा लगभग 200 बहेलियों की सशस्त्र निजी सेना थी। वे उस समय के जिला जज मिस्टर टक्कर के अत्यंत करीबी मित्र माने जाते थे।
जब क्रांतिकारियों ने खागा पर अधिकार कर लिया और फतेहपुर की ओर बढ़े, तब भयभीत होकर मिस्टर टक्कर अपने मित्र बाबा गयादीन दुबे के पास कोराईं पहुँचे और उनसे शरण की याचना की। मित्रता निभाते हुए बाबा गयादीन ने उन्हें आश्वासन दिया और सुरक्षित रूप से जिला मुख्यालय भिजवा दिया।
अगले दिन, जब बाबा गयादीन दुबे अपनी सेना लेकर जिला मुख्यालय पहुँचे और वहाँ उनका आमना-सामना क्रांतिकारियों से हुआ, तो उन्होंने निजी मित्रता को त्यागकर देश का साथ चुनने का निर्णय लिया। यह देखकर और इस निर्णय से व्यथित होकर मिस्टर टक्कर ने आत्महत्या कर ली।
टक्कर की मृत्यु के बाद बाबा गयादीन दुबे पर अपने मित्र के साथ विश्वासघात का आरोप लगाया गया। कहा जाता है कि मरने से पहले टक्कर ने छत पर लिख दिया था कि “बाबा गयादीन दुबे ने मेरे साथ विश्वासघात किया है।” इसी आरोप के आधार पर अंग्रेजी शासन ने बाबा गयादीन दुबे को गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तारी के बाद उन्हें तथा उनके पिता पंडित सुबह सीताराम दुबे को जेल में बंद कर दिया गया।
जेल में निरंतर अपमान और अमानवीय व्यवहार से बचने के लिए दोनों ने अपनी अंगूठी में जड़े हीरे को चाटकर आत्महत्या कर ली। उनका यह त्याग और बलिदान देशभक्ति, आत्मसम्मान और राष्ट्रनिष्ठा की एक अमर मिसाल बन गया।
